भारतीय पुलिस फ़ोर्स का पूरा इतिहास

Newsman update कहा जाता है कि, सीमा पर देश के वीर सपूत  प्राणों का बलिदान देकर देश को सुरक्षा प्रदान करते हैं तो वहीं देश के भीतर पुलिस फोर्स लोगों को उनका हक़ दिलाने के साथ-साथ उनकी हिफाज़त करती है। लेकिन  क्या आप जानते हैं कि, जब हिन्दुस्तान में कोई क़ानून नहीं था, पुलिस फ़ोर्स मौजूद नहीं थी तब कैसे लोगों को न्याय मिलता था। आख़िर पुलिस विभाग की स्थापना कब  और किसने की ? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनको जानने के लिए हम लोग हमेशा से तत्पर होते हैं। तो चलिए आपको बताते हैं भारतीय पुलिस फ़ोर्स का पूरा इतिहास .दरअसल,सर्वप्रथम ब्रिटिश भारत में इस विभाग की स्थापना गवर्नर-जनरल लार्ड कार्नवालिस 1786-93  ने की। कलकत्ता, ढाका, पटना तथा मुर्शिदाबाद में चार अधीक्षकों के अधीन पुलिस रखी गई। प्रत्येक ज़िले में एक पुलिस अधीक्षक की नियुक्ति हुई। उसके अधीन प्रत्येक सब-डिवीजन में एक उप-पुलिस अधीक्षक, प्रत्येक सर्किल में एक पुलिस इंसपेक्टर तथा प्रत्येक थाने में एक थानाध्यक्ष होता था। थानाध्यक्ष के अधीन कई कांस्टेबल होते थे। इन सबको राज्य से वेतन दिया जाता था और वे सामूहिक रूप से अपने-अपने क्षेत्र में शांति और व्यवस्था बनाये रखने के लिए ज़िम्मेदार होते थे।गाँवों में चौकीदार रखे जाते थे, जिन्हें सरकार मामूली वेतन दिया करती थी। उनका काम अपने क्षेत्र के बदमाशों पर नज़र रखना और कोई दंडनीय अपराध होने पर उसकी सूचना थानाध्यक्ष को देना होता था। कलकत्ता, बम्बई तथा मद्रास के प्रेसीडेंसी नगरों में पुलिस कमिश्नर के अधीन एक संयुक्त पुलिसदल होता था.1861 ई. के पुलिस एक्ट के द्वारा पुलिस को प्रान्तीय संगठन बना दिया गया और उसका प्रशासन सम्बन्धित प्रान्तीय सरकारों के ज़िम्मे कर दिया गया। प्रत्येक प्रान्त के पुलिस संगठन का प्रधान पुलिस महानिरीक्षक होता है, जो कि उसका नियंत्रण करता है।1902 ई. में पुलिस प्रशासन की जाँच करने के लिए एक कमीशन की नियुक्ति की गई और उसकी सिफ़ारिशों के आधार पर पुलिस दल में सुधार करने और उसका मनोबल ऊँचा उठाने के लिए क़दम उठाये गये।

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